9990004674

Consult Our Doctor- For Free

Sign In Or Create an Account

सफ़ेद दाग (Vitiligo) – कारण , लक्षण और आयुर्वेदिक उपचार

हमारी पहचान हमारे आउटलुक से होती है और हमारा आउटलुक हमारी पर्सनालिटी और हमारे त्वचा के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है| कोई भी व्यक्ति हमारी बाहरी त्वचा को ही देख पता है हमारे अंदर के organs को नहीं| हमारी स्किन से ही वह हमारी पर्सनालिटी का अंदाज़ा लगता है| आयुर्वेद के हिसाब से संपूर्ण शरीर को बाहर से आवृत करने वाल अंग त्वचा होती है| आयुर्वेद मतानुसार त्वचा के 7 भेद बताये गए है:

  • अवमसिनी- यह सबसे पतली और बाहरी वह है यह सभी वर्णों को प्रकट करती है और आधुनिक मातानुसार यह horny layer है|
  • लोहिता- इसमें रक्तवाहिनियां रहती है| इसका वर्ण लाल होता है| आधुनिक मतानुसार यह startum lucidum है| यह दूसरी वह है|
  • श्वेत- यह तीसरी वह है| इसमें वर्ण श्वेत होता है आधुनिक मतानुसार इसे startum granulosum कहते है|
  • वाम्रा- यह चतुर्थ वह है| इसमें वर्ण ताम्र होता है| आधुनिक मतानुसार इसे malpishian layer कहा जाता है| यह श्वित व कुष्ठ रोग का अधिष्ठान है|
  • वेदिनी- यह पांचवी वह होती है| आधुनिक मतानुसार इसे papillary layer कहते है|
  • रोहिणी-यह छठी वह होती है| आधुनिक मतानुसार इसे raticular layer कहते है|
  • मांसधरा- यह सप्तम वह होती है ओर आधुनिक मंतानुसार इसे subcutanous tissue या फिर muscular माना कहा जाता है| इसके हट जाने पर मनुष्य मे अपने आप को अन्धगर मे प्रविष्ट हुआ अनुभव करता है|

According to modern science the skin cover the entire outer surface of the body; structurally the skin consists of two layers outer epidermis and inner dermis layer. The epidermis is the outer mort layer of skin, provider a waterproof barrier and creator our skin tone. The dermis beneath the epidermis contains tough connective tissue, hair follicles and sweet glands, fat.

There are the five layers of the epidermis

  1. Stratum basale
  2. Stratum spinosum
  3. Stratum granulosum
  4. Stratum lucidum
  5. Stratumcorneum

त्वचा और रंग हमारे चारो और के मौसम पर निर्भर करता है| त्वचा का रंग melanin pigment की वजह सेहोता है और इसी melanin pigment की कमी के कारण श्वेत रंग होता है| श्वेत रोग हमारी स्किन की चोथे layer जिसे हम आयुर्वेद मे ताम्रा कहते है उसमे होने वाली व्याधि है|In modern science श्वित को हम vitilogo कहते है विटिलिगो इन्फेक्शस नहीं है|

“समदोष: समाग्निश्च समधातु मल क्रिय:।

प्रसन्नात्मेंद्रिय मन: स्वस्थ इत्यभिधीयते।।“

शरीर मे दोष, धातु, माल, अग्नि, सम अवस्था मे होती है और साथ हमारी आत्मा, इन्द्रिय और मन प्रसन्न होते है तब शरीर स्वस्थ होता है|

“श्वेतेते इति श्वितम”

जब शरीर के किसी भी अंग की त्वचा का वर्ण श्वेत हो जाता है और वह देखने मे अप्रिय होती है तब उसे श्वित रोग कहते है| modern science मे हम इसे विटिलिगो, leucoderma या फिर वाइट पैचेज कहते है| Vitiligo is an advance  cutaneous disorder characterized by white patches, surrounded by areas of normal pigmentation. It is more common in topics and in blacks.

Causes

आयुर्वेद मातानुसार हमारे त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के प्रकोप से होता है| इन दोनों के बढने के कारण हमारी डाइट, लाइफस्टाइल या किसी भी प्रकार की स्किन injury हो सकती है| ये बढे हुए दोष हमारी रक्त, मांस और मेद धातु को दूषित कर श्वित रोग को उत्पन्न करती है|

According to modern science the cause of Vitiligo is not known. It is generally considered as an auto immune disease. An auto-immune disease happens when a person’s immune system wrongly attacks a part of his/her own body. In case of Vitiligo, the immune system probably destroys the melanocyte in the body.

Complication

  • Social or psychological distress
  • Sunburn andskin cancer
  • Iritis (inflammation of the iris)
  • Hearing loss

Spread

There is no way to tell if Vitiligo will spread. For some people the white patches do not spread. For some people Vitiligo spreads slowly and in some people it spreads quickly. Some people reported many patches after physical or emotional stress.

Sign and symptoms

  • Patchy loss of skin color
  • Premature whitening or graying of the hair on your scales, eyelashes, eyebrows or beard.
  • Loss of the color in the tissue that line inside of your mouth and nose.
  • Loss or change in the color of the inner layer of the eye ball.

Treatment

श्वित मे हम औषधीय और पंचकर्म दोनों चिकित्सा करते है| औषधियों के अलावा हम सिर्फ पंचकर्म भी करते है और केवल पंचकर्म करने से भी रोगी को काफी आराम मिलता है|

चिकित्सा- 1. विरेचन

2 औषधिय चिकित्सा

  1. बहुची तेल
  2. अरिवरक तेल
  3. महामारिच्यादी तेल
  4. तुवरक तेल
  5. स्वर्णमाक्षिक भस्म
  6. शिवतारी रस
  7. rasmanikya
  8. गंधक रसायन
  9. आरोग्यवर्धिनी वती
  10. किशोरे गुग्गुलु
  11. panchnimb चूर्ण
  12. बाहुच्यादी चूर्ण
  13. manjisthadi चूर्ण
  14. खादिरारिष्ट
  15. पंचतिबत घृत

पंचकर्म

श्वित रोग कुष्ठ से भी अधिक घृणा उत्पन्न करने वाली व्याधि है और यह शीघ्रता से असाध्य हो जाती है| अतः इसमें चिकित्सा शीघ्रता से करना चाहिए जैसे हम घर से आग लाते ही त्वरित व्यवस्था करते है|

संत्रसन (mild purgative therepy, the type of viro)

श्वित के रोगी मे करना चाहिए| अब शरीर की शुद्धि होने के बाद अधिक शुद्धि के लिए कठ गुलर की रस व गुड का प्रयोग करना चाहिए| उसके बाद लगातार 3 दिन तक धुप मे बैठना चाहिए| अगर धुप मे बैठने से प्यास लगे तो पेय का पान करना चाहिए| धुप सेवन के पश्चात् मंडल के स्थान की त्वचा पर विस्फोट उत्पन्न हो जाता है इन्हें कांटे से फोड़कर लसिक स्त्राव होने देते है तत्पश्चात निरंतर 15 दिन तक पलाश की क्षार को (half cooked jaggery) के साथ पीना चाहिए|

Posted by: On July 7, 2018

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *